Tuesday, June 7, 2016

ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਸ਼ਹੀਦੀ




ਗੁਰੂ ਜੀ ਦਾ ਮਨ ਬੜਾ ਵਿਸ਼ਾਲ ਸੀ ਤੇ ਧੀਰਜ ਵਾਲਾ ਸੀ, ਸਰੀਰ ਭਾਵੇਂ ਤੁੰਬਾ ਤੁੰਬਾ ਹੋ ਚੁੱਕਾ ਸੀ, ਪਰ ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਦੇ ਇਸ ਭਾਣੇ ਤੇ ਕੋਈ ਸ਼ਿਕਵਾ ਨਹੀਂ ਸੀ।ਸੰਸਾਰ ਨੂੰ ਸਿਖਿਆ ਦਿੰਦਿਆਂ ਉਹਨਾਂ ਸਮਝਾਇਆ ਕਿ ਦੁਖ ਤੇ ਸੁਖ, ਜੀਵਨ ਦੇ ਦੋ (ਕਪੜ ਰੂਪ) ਪਹਿਲੂ ਹਨ ,ਜਿਸ ਨੂੰ, ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਪਾਉਣ ਲਈ ਹਮੇਂਸਾਂ ਤਿਆਰ ਰਹਿਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ, ਸਦੀਵੀ ਸੁੱਖ ਦੀ ਹੀ ਤਾਂਘ ਨਹੀਂ ਰੱਖਣੀ ਚਾਹੀਦੀ , ਪਰਮੇਸ਼ਰ ਦੀ ਰਜ਼ਾ ਤੇ ਕੋਈ ਸ਼ਿਕਵਾ ਨਹੀਂ ਕਰਣਾ ਚਾਹੀਦਾ : 

ਨਾਨਕ ਬੋਲਣੁ ਝਖਣਾ,ਦੁਖ ਛਡਿ ਮੰਗੀਅਹਿ ਸੁਖ ॥ 
ਸੁਖੁ ਦੁਖੁ ਦੁਇ ਦਰਿ ਕਪੜੇ, ਪਹਿਰਹਿ ਜਾਇ ਮਨੁਖ ॥

ਇੰਝ ਲਗਦਾ ਸੀ ਕਿ ਤੱਤੀ ਤਵੀ ਤੇ ਬੈਠ ਕੇ ਵੀ 'ਸ਼ਾਤੀ ਦੇ ਪੁੰਜ' ਦੇ ਮੁਖੋਂ ਇਹ ਬੋਲ ਗੂੰਜ ਰਹੇ ਸਨ ;

ਤੇਰਾ ਕੀਆ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ, ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਨਕ ਮਾਗੈ॥

ਅੰਤ ਕਈ ਦਿਨਾਂ ਦੇ ਕਠੋਰ ਤਸੀਹਿਆਂ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਸਰੀਰ ਨਾਲ ਪੱਥਰ ਬੰਨ ਕੇ ਉਹਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਰਾਵੀ ਵਿਚ ਰੋੜ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ। ੩੦ ਮਈ, ੧੬੦੬ ਈਸਵੀ ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਜੋਤੀ ਜੋਤ ਸਮਾ ਗਏ।
ਇਸ ਤਰਾਂ ਸਿਖ ਧਰਮ ਦਾ ਮਹਾਨ ਸੂਰਜ ਜੱਗ ਨੂੰ ਸ਼ਾਂਤੀ ,ਸਦਭਾਵਨਾ, ਨਿਰਮਲਤਾ, ਠੰਡਤਾ, ਪ੍ਰੇਮ, ਪਰਉਪਕਾਰਤਾ, ਸ਼ਹਾਦਤ ਦੇ ਸ਼ੁੱਭ ਗੁਣ ਸਿਖਾਂਉਦਾ ਸਰੀਰ ਕਰਕੇ ਭਾਵੇਂ ਅਸਤ ਹੋ ਗਿਆ, ਪਰ ਜੋਤ ਕਰਕੇ ਸਦਾ ਲਈ ਅਮਰ ਹੋ ਗਿਆ। 

Friday, March 4, 2016

Jaa tu mere wal hain shabad




Translation in English 

When You are on my side, Almighty Waheguru, what do I need to worry about?
You entrusted everything to me, when I became Your slave.
My wealth is inexhaustible, no matter how much I spend and consume.
All your creation is looking after me and serving me.
All my enemies have become my friends and no one wishes me ill.
No one calls me to account, since the Almighty is my forgiver.
I have become blissful, and I have found peace, meeting with the Guru, the Lord of the Universe.

All my affairs have been resolved, since You are pleased with me.


Translation in Hindi


प्रभु, जब तूं मेरे साथ है तो मुझे किस बात की चिंता ? तूं नें मुझे सब कुछ सौंप दीआ है और मैं तेरा गुलाम बन गया हूँ. धन की मुझे कभी कमी महसूस नहीं हुई चाहे मैं जितना भी खर्च करूं. सारा जगत, सारी सृष्टि मेरी देख भाल और मेरी सेवा में लगी हुई है. मेरे सभी विरोधी मेरे मित्र बन गये हैं और कोइ भी मेरा बुरा नहीं चाहता. जब परमात्मा ने ही मुझे बख्श दीआ है कोइ ओर मुझ से हिसाब नहीं पूछता है. गुरु मिलन से ओर प्रभु दर्शन द्वारा मुझे आनंद ओर सुख की प्राप्ती हो गयी है. मेरे सभी काज संवर गए हैं क्यो की तूं मुझ से प्रसन्न है. 

ਸਤਿਨਾਮ ਜੀ

Thursday, April 30, 2015

अकाल तख्त साहिब



श्री गुरु अर्जुनदेव जी की शहादत के बाद सिखों को जगह-जगह हुक्मनामे लिखे गए कि श्री गुरु अर्जुनदेव जी ज्योति जोत समा गए हैं और श्री हरगोबिन्द राय जी गद्दी पर विराजमान हुए हैं। संगत आकर दर्षन करे। यह भी लिखा गया कि जो कोई अच्छा घोड़ा, अच्छा शस्त्र लाएगा उस पर गुरुजी की बहुत खुशी होगी। इस मजमून के हुक्मनामे दिल्ली, आगरा, मकसूदाबाद, पटना, 
काषी, फरूखाबाद, काबुल, कंधार, पेषावर, कष्मीर, तिब्बत, उज्जैन आदि जगह भेजे गए और आषाढ़ सुदी १० की तिथि को अमृतसर पधारने के लिए लिखा गया। गुरु हरगोबिन्द जी ने संगतों के ठहरने की व्यवस्था की। लंगर की व्यवस्था, घोड़ों के लिए तबेले, घोड़ों के साज, काठी, लगाम तथा शस्त्रों के निर्माण की भी व्यवस्था की गई। शस्त्र निर्माण के लिए राजस्थान से कुषल कारीगर मंगाए गए और यह भी फरमाया कि उनको नौकरी पर रख लिया जाए। संगत देष के कोने कोने से भारी संख्या में पहुंचने लगी। सरोवर साहिब के चारों ओर डेरे लगने लगे। संगत पवित्र अमृतसर सरोवर में स्नान कर व हरि मंदिर साहिब में कीर्तन 
श्रवण कर निहाल हुई। संगत श्री गुरु हरगोबिन्द जी के दर्षन कर धन्यता का अनुभव करने लगी। श्री गुरु हरगोबिन्द जी ने गहन मंथन के बाद यह विचार किया कि हरिमंदिर साहिब में पोथी साहिब विराजमान है और वहां गुरु का कीर्तन होता है। इसीलिए अन्य कार्यक्षेत्रों के लिए, दुनियावी मसलों के लिए व राजनीतिक जागृति के लिए अलग स्थान की आवष्यकता है। श्री गुरु हरगोबिन्द जी ने हरमन्दिर साहिब के सामने की दर्षनीड्योढ़ी के आगे का स्थान चयनित किया। श्री गुरु हरगोबिन्द जी स्वयं अपने हाथों से ईंटे ढ़ोकर लाए। भाई गुरदास जी गारा बनाकर लाते थे। भाई बुड्ढ़ा जी ईंटे चुन रहे थे। इस प्रकार जुगो जुग अटल अकाल तख्त साहिब एक थड़े के रूप में अस्तित्व में आया। श्री गुरु हरगोबिन्द जी सौष्ठव के प्रतीक थे और उनके द्वारा मजबूत ईंटों की आपूर्ति की जा रही थी। भाई गुरदास जी ज्ञान और अध्ययन के प्रतीक थे, और उनके द्वारा गारे की आपूर्ति। 
सत् श्री अकाल 


ताती वाओ न लागई


Friday, April 10, 2015

गुरू अरजन देव जी



     श्री गुरू अरजन देव जी 

गुरू जी का जन्म(प्रकाश) सन् 1534 में चूना मण्डी 
लाहौर,पाकिस्तान में हुआ था
उनकी माता जी का नामः माता दया जी और पिता जी का नामः हरिदास जी था उनका 
विवाह सन 1554 में बीबी भानी जी से हुआ था

गुरू रामदास जी गुरू अमरदास जी के दामाद थे। 
उनकी सन्तान 3 बेटे थे 
पृथ्वीचन्द,महादेव और अरजन देव जी
गुरू अरजन देव जी ने अमृतसर नगर बसाया 

श्री गुरू रामदास जी चौथे गुरू और पाँचवें गुरू श्री गुरू अरजन देव साहिब जी के पिता जी थे।
गुरू साहिब को गुरूआई सन् 1574 में मिली
श्री अमृतसर साहिब जी का पहले नाम गुरू चक्क रखा गया था
उनके समकालीन बादशाह अकबर थे
गुरू रामदास जी का पुराना नामः भाई जेठा जी था
गुरू साहिब सन् 1581 ईस्वी में श्री गोइंदवाल साहिब में जोति जोत समाये 



Thursday, November 27, 2014

गुरू गोबिंद सिंह परिचय

                                            गुरु गोबिंद सिंह

श्री गोबिंद राय जी के जन्म से पहले एक दिन माता नानकी जी ने स्वाभाविक श्री गुरु तेग बहादर जी  को कहा कि बेटा! आप जी के पिता ने एक बार मुझे वचन दिया था कि तेरे घर तलवार का धनी बड़ा प्रतापी शूरवीर पोत्र इश्वर का अवतार होगा| मैं उनके वचनों को याद करके प्रतीक्षा कर रही हूँ कि आपके पुत्र का मुँह मैं कब देखूँगी| बेटा जी! मेरी यह मुराद पूरी करो, जिससे मुझे सुख कि प्राप्ति हो|

अपनी माता जी के यह मीठे वचन सुनकर गुरु जी ने वचन किया कि माता जी! आप जी का मनोरथ पूरा करना अकाल पुरख के हाथ मैं है| हमें भरोसा है कि आप के घर तेज प्रतापी ब्रह्मज्ञानी पोत्र देंगे|

गुरु जी के ऐसे आशावादी वचन सुनकर माता जी बहुत प्रसन्न हुए| माता जी के मनोरथ को पूरा करने के लिए गुरु जी नित्य प्रति प्रातकाल त्रिवेणी स्नान करके अंतर्ध्यान हो कर वृति जोड़ कर बैठ जाते व पुत्र प्राप्ति के लिए अकाल पुरुष कि आराधना करते|

गुरु जी कि नित्य आराधना और याचना अकाल पुरख के दरबार में स्वीकार हो गई| उसुने हेमकुंट के महा तपस्वी दुष्ट दमन को आप जी के घर माता गुजरी जी के गर्भ में जन्म लेने कि आज्ञा की| जिसे स्वीकार करके श्री दमन (दसमेश) जी ने अपनी माता गुजरी जी के गर्भ में आकर प्रवेश किया| 


श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पोरव सुदी सप्तमी संवत 1723 विक्रमी को श्री गुरु तेग बहादर जी के घर माता गुजरी जी की पवित्र कोख के पटने शहर में हुआ|

माता नानकी जी ने अपने पौत्र के जन्म की खबर देने के लिए एक विशेष आदमी को चिट्ठी देकर अपने सुपुत्र श्री गुरु तेग बहादर जी के पास धुबरी शहर भेजा| गुरु जी ने चिट्ठी पड़कर जब राजा राम सिंह को खुशी भरी खबर सुनाई तब राजा ने अपने फौजी बाजे बजवाए| तोपों की सलामी दी तथा गरीबों को दान दिया| चिट्ठी लेकर आने वाले सिख को गुरु जी ने बहुत धन दिया उसका लोक परलोक संवार दिया|
पटने से आनंदपुर साहिब बुलाकर श्री गुरु तेग बहादर जी ने अपने सुपुत्र श्री गोबिंद राय जी को घुड़ सवारी, तीर कमान, बन्दूक चलानी आदि कई प्रकार की शिक्षा सिखलाई का प्रबंध किया| बच्चो के साथ बाहर खेलते समय मामा कृपाल जी को आपकी निगरानी के लिए नियत कर दिया| इस प्रकार श्री गुरु तेग बहादर जी के किए हुए प्रबंध के अनुसार आप शिक्षा लेते रहे|
पहला विवाह
संवत 1734 की वैसाखी के समय जब देश विदेश से सतगुरु के दर्शन करने के लिए संगत आई और लाहौर की संगत में एक सुभीखी क्षत्री जिसका नाम हरजस था उन्होंने अपनी लड़की जीतो का रिश्ता श्री (गुरु) गोबिंद राय जी के साथ कर दिया| विवाह की मर्यादा को 23 आषाढ़ संवत 1734 को पूर्ण किया| आज कल यह स्थान "गुरु का लाहौर" नाम से प्रसिद्ध है|

साहिबजादे
    चेत्र सुदी सप्तमी मंगलवार संवत 1747 को साहिबजादे श्री जुझार सिंह जी का जन्म हुआ|
    माघ महीने के पिछले पक्ष में रविवार संवत् 1753 को साहिबजादे श्री जोरावर सिंह जी का जन्म हुआ|
    बुधवार फाल्गुन महीने संवत् 1755 को साहिबजादे श्री फतह सिंह जी का जन्म हुआ|

दूसरा विवाह
संवत 1741 की वैसाखी के समय जब देश विदेश से सतगुरु के दर्शन करने के लिए संगत आई और लाहौर की संगत में एक कुमरा क्षत्री जिसका नाम दुनीचंद था उन्होंने अपनी लड़की सुन्दरी का विवाह सात बैसाख श्री (गुरु) गोबिंद राय जी के साथ कर दिया|

साहिबज़ादे

23 माघ संवत 1743 को साहिबजादे श्री अजीत सिंह जी का जन्म पाऊँटा साहिब में हुआ|

गुरु अंगद देव जी का परिचय

गुरु अंगद देव जी

श्री गुरु अंगद देव जी का जनम वैसाख सुदी 1,संवत १५६१,३१ मार्च ,सन १५०४ में मत्ते दी सराए ,मुक्तसर ,जिला फिरोजपुर में पिता फेरुमल और माता दया कौर जी के घर हुआ था 1 उनकी पत्नी का नाम बीबी खीन्वी जी था I उनके दो पुत्र दासु जी और दातु जी तथा दो पुत्रियाँ बीबी अमरो ,बीबी अनोखी जी थे

गुरु अंगद देव जी ने गुरुमुखी *पंजाबी * का चलन प्रारम्भ किया ,ये १३ वर्षो तक गुरुपद पर आसीन रहे ,गुरु जी छुआछूत के विरोधी थे ,इन्होने लंगर का प्रचार किया

ये सिखों के दुसरे गुरु थे ,इनका पहला नाम लहना जी था ,ये गुरु सेवा में ही प्रसन्न रहते थे ,गुरु नानक देव जी ने इन्हें अपने गले लगाया और अंगद नाम दिया तथा गुरुगद्दी सौंपी

मुग़ल सम्राट बाबर के भारत पर दुसरे हमले के समय गाँव मत्ते दी सराय नष्ट हो गया इसलिए ये अपने पिता जी के साथ खदूर गाँव आ गए ,यहीं इनका विवाह भी हुआ और ये दूकान चलाने लगे ,ये माता के भक्त थे ,हर वर्ष अपने साथियों के साथ वैष्णव देवी के दर्शनों को जाते थे ,खदूर में एक सिहक गुरु भाई रहते थे जिनका नाम जोधा था ,उनसे गुरु नानक देव जी की महिमा सुन कर ये वहां गए ,गुरु नानक देव जी ने इन्हें पूछा की आप कहाँ से आय हैं और कहाँ जा रहे हैं ,तो लहना जी ने बता दिया की वैष्णव देवी के दर्शनों को जा रहे हैं और आप का नाम सुनकर आप के दर्शन को चला आया कृपया करके मुझे उपदेश दीजिये ,तो गुरु जी ने कहा भाई लहना जी ,तुझे प्रभु का वरदान है की तू लेगा और हम दे देंगे , तब लहना जी ने हाथ जोड़ कर कहा की मेरा जीवन सार्थक कीजिये ,गुरु जी ने कहा की जाओ और अकाल पुरुख की भक्ति करो ,सब उसी के बनाय हुए हैं ,उनकी बात सुनकर लहना जी ने साथियों से कहा की आप देवी के दर्शनों को जाओ मैं यहीं रहूँगा ,इस तरह उनके साथी चले गए ,ये भी कुछ समय बाद अपनी दूकान को लौट आये लेकिन इनका मन गुरु चरणों में ही लगा रहता था